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            <article-id pub-id-type="doi">
                10.65919/uimrj.2026.v2i2001            </article-id>

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                <article-title>
                    आधुनिक भारत में राष्ट्रवाद का विकास: उदारवादी से उग्रवादी चरण तक एक सैद्धांतिक अध्ययन                </article-title>
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            <abstract>
                <p>आधुनिक भारत में राष्ट्रवाद का विकास एक क्रमिक, बहुआयामी और संघर्षशील ऐतिहासिक प्रक्रिया रही, जिसमें उदारवादी और उग्रवादी दोनों चरणों ने स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा निर्धारित की। प्रस्तुत अध्ययन का उद्देश्य भारतीय राष्ट्रवाद के उद्भव, उसके वैचारिक आधार, सामाजिक पृष्ठभूमि तथा राजनीतिक परिवर्तन का सैद्धांतिक विश्लेषण करना है। उदारवादी चरण में संवैधानिक सुधारों, प्रार्थना-पत्रों, प्रतिनिधित्व, नागरिक अधिकारों और शांतिपूर्ण राजनीतिक साधनों पर बल दिया गया। दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले और फिरोजशाह मेहता जैसे नेताओं ने आर्थिक शोषण की आलोचना करते हुए राष्ट्रीय चेतना को संगठित आधार प्रदान किया। किन्तु औपनिवेशिक दमन, बंगाल विभाजन, आर्थिक विषमता तथा उदारवादी रणनीतियों की सीमाओं ने अधिक सक्रिय और उग्र राष्ट्रवाद को जन्म दिया। बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल ने स्वराज, स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा को राजनीतिक संघर्ष के साधन के रूप में प्रस्तुत किया। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि उदारवादी और उग्रवादी धाराएँ परस्पर विरोधी होते हुए भी भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की पूरक शक्तियाँ थीं। उदारवादियों ने राजनीतिक संगठन, सार्वजनिक विमर्श और संवैधानिक चेतना विकसित की, जबकि उग्रवादियों ने आत्मनिर्भरता, जनसक्रियता और राष्ट्रीय स्वाभिमान को प्रबल बनाया। इन दोनों चरणों के संयुक्त प्रभाव ने स्वतंत्रता संघर्ष को व्यापक सामाजिक आधार, वैचारिक गहराई तथा भविष्य के जनांदोलनों के लिए राजनीतिक ऊर्जा प्रदान की। यह अध्ययन राष्ट्रवाद को केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण, आर्थिक स्वावलंबन और सामूहिक अस्मिता की प्रक्रिया के रूप में रेखांकित करता है।</p>
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